"कौलान्तक संप्रदाय" योगिनी शक्तियों की उपासना को प्रमुखता देता है। चौंसठ योगिनी ही कलियुग में सशरीर दर्शन देने में समर्थ मानी जाती हैं। चौंसठ योगिनी मंडल में सत्व, रज, तम तीनों गुण विद्यमान होते हैं, किन्तु इनकी साधना को राजसी रीति से संपन्न करना ही श्रेष्ठ कहा गया है। योगिनियों को साध लेने वाला कभी भी अकेला नहीं होता। योगिनियाँ साधक को स्वयं ज्ञान देती हैं। भोग में प्रवृत्ति भी इनका ही गुण है। अक्सर ये पूछा जाता है की साधू-सन्यासियों के पास इतना पैसा कहाँ से आता है? वो महँगी गाड़ियों आश्रमों में राजसी तरीकों से कैसे रहते हैं। इसके पीछे कारण हैं योगिनी शक्तियों की साधना और आराधना। इसी कारण योगिनियों को भारतीय कर्मकांड सहित तंत्र नें अपनी पूजा उपासना में बड़ा अहम् स्थान प्रदान किया है। "कौलान्तक संप्रदाय प्रमुख" ईशपुत्र-कौलान्तक नाथ" संक्षेप में ये कहते हैं की इन चौंसठ योगिनियों का सिद्ध होना ही चौंसठ कलाओं को हस्तगत करने का उपाय है।
गुरु परंपरा और धर्मविरोधी
गुरु-शिष्य परंपरा भारत की एक सामाजिक, धार्मिक व आध्यात्मिक हिन्दू परंपरा है और उसका सामाजिक उत्तरदायित्व बड़ा गहरा है। ये उत्तरदायित्व है समाज को अपने स्वाभिमान, राष्ट्र, शक्ति, पूर्वजों के शौर्य-ज्ञान सहित अपनी सम्पदाओं, धन आदि के सदुपयोग के लिए प्रेरित करना। हिन्दुओं पर मलेच्छों, बाहरी आक्रमणकारियों सहित, नास्तिकों व घर के भीतर के सपोलों ने बहुत घात किये हैं जो अब भी जारी ही हैं। इसलिए हिंदुओं ने इससे निपटने के लिए 'गुरुडम' को बढ़ावा दिया और 'चमत्कारी बाबाओं' को भारी संख्या में धर्म युद्ध के लिए उतार दिया। इसे अंग्रेज़ी भाषा में 'सर्वाइवल ऑफ़ ए कलचर' कहा जाता है। इसलिए अंतर इन सभी बाबाओं के तरीकों में हो सकता है, लेकिन इनके उद्देश्यों में नहीं और उद्देश्य समान ही है- शराब-जुए, नशों और अय्याशी में खर्च होने वाले पैसों का धर्म, मंदिर, संस्कृति व धार्मिकों के लिए प्रयोग करना। साथ ही इस समाज में मूर्ख, अश्लील, अपराधी-माफिया, उगाही-बसूली वाले 'प्रसिद्धि' हासिल कर उसका दुर्पयोग करते हैं। इसलिए इन बाबाओं को प्रसिद्धि दी जाती है ताकि उस प्रसिद्धि का प्रयोग अधर्मी,...

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